Urticaria

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Urticaria

Urticaria- शीतपित्त आम तौर पर पाचन तंत्र की गड़बड़ी और खून में गर्मी बढ़ जाने के कारण होता है। वातावरण में उपस्थित कई तरह के कारक जैसे की दवाइयाँ (जैसे की कोडेयैन, आस्प्रिन, इब्यूप्रोफन, पेनिसिलिन, क्लोट्रीमाज़ोले, त्रिचज़ोले, सुल्फ़ोनामिदेस, डेक्सट्रोएम्फेटामिने, आंतिकोनउलसंत्स, सेफकलोर, पीरसेटम आदि), खाद्य पदार्थ आदि इसके कारको में शामिल हैं। इसके कारण गर्मी से आने के बाद ठंड़ा पानी पीना, कोल्ड ड्रिंक या आइसक्रीम खाना, तेल-मिर्च, गर्म मसाले और अम्ल रसों से बने चटपटे खाद्य पदार्थों और बाजार में बिकने वाले फास्ट फूट व चाइनीज खाना खाने से इस रोग के होने का ख़तरा बढ़ जाता है। इसका कारक चाहे जो भी हो, यह रोग हिस्टामीन नामक एक टाक्सिस पदार्थ के त्वचा में प्रवेश कर खुजली के साथ चकत्ते पैदा करने से होता है।"

Urticaria Urticaria- शीतपित्त आम तौर पर पाचन तंत्र की गड़बड़ी और खून में गर्मी बढ़ जाने के कारण होता है। वातावरण में उपस्थित कई तरह के कारक जैसे की दवाइयाँ (जैसे की कोडेयैन, आस्प्रिन, इब्यूप्रोफन, पेनिसिलिन, क्लोट्रीमाज़ोले, त्रिचज़ोले, सुल्फ़ोनामिदेस, डेक्सट्रोएम्फेटामिने, आंतिकोनउलसंत्स, सेफकलोर, पीरसेटम आदि), खाद्य पदार्थ आदि इसके कारको में शामिल हैं। इसके कारण गर्मी से आने के बाद ठंड़ा पानी पीना, कोल्ड ड्रिंक या आइसक्रीम खाना, तेल-मिर्च, गर्म मसाले और अम्ल रसों से बने चटपटे खाद्य पदार्थों और बाजार में बिकने वाले फास्ट फूट व चाइनीज खाना खाने से इस रोग के होने का ख़तरा बढ़ जाता है। इसका कारक चाहे जो भी हो, यह रोग हिस्टामीन नामक एक टाक्सिस पदार्थ के त्वचा में प्रवेश कर खुजली के साथ चकत्ते पैदा करने से होता है।"


शीतपित्त के प्रकोप में त्वचा पर वेल्स नामक चित्तियाँ उभरने लगती हैं, जिनकी आधार लाल रंग की होती है। ये चित्तियाँ त्वचा के किसी भी भाग में प्रकट हो सकती हैं और जल्द ही इनका प्रसार पूरे शरीर में हो जाता है। इसके प्रकोप में चकत्ते की जगह त्वचा लाल और सूजनयुक्त हो जाती है, जिनमें उभार भी दिखाई देने लगती है।


शीतपित्त, जिसे आमतौर पर पाचन तंत्र की अस्त-व्यस्तता और शरीर में गर्मी बढ़ने के कारण होता है, एक खतरनाक रोग है। इसके कारक में वातावरण में मौजूद विभिन्न प्रकार की दवाएँ, जैसे कोडेयैन, आस्प्रिन, इब्यूप्रोफेन, पेनिसिलिन, और अन्य एंटीबायोटिक्स आदि, समेत अन्य खाद्य पदार्थों का सेवन भी शामिल होता है। गर्मी के मौसम में ठंडा पानी पीना, कोल्ड ड्रिंक्स और चटपटे खाने से बचना भी इस रोग को बढ़ा सकता है। इसका कारण हिस्टामीन नामक टॉक्सिन त्वचा में प्रवेश करता है, जो खुजली और चकत्ते पैदा करता है. इसलिए, इस खतरनाक बीमारी से बचने के लिए सावधानी बरतना अत्यंत आवश्यक है।

चीरकलिक और तीक्ष्ण शीतपित्त का इलाज विभिन्न तरीकों से किया जाता है, जो मुख्य रूप से रोगी के शिक्षण, त्वरित कारकों से बचाव और आंटिहिस्टमिन्स पर निर्भर करता है। चीरकलिक शीतपित्त का इलाज अक्सर कठिन होता है और इससे गंभीर अपंगता की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। तीक्ष्ण शीतपित्त के मरीज़ों में उपचार करना भी चुनौतीपूर्ण होता है। अधिकांश मामलों में शीतपित्त के लक्षणों में सुधार हो सकता है, लेकिन इसका इलाज लंबे समय तक की संघर्षशील प्रक्रिया हो सकती है। इस रोग के लक्षणों को कम करने के लिए विभिन्न प्रकार की दवाओं का प्रयोग किया जाता है, जैसे की आंटिहिस्टमिन्स, ग्लूकोकॉर्टिकाय्ड्स और अन्य उपचार. अगर रोगी को अंजिओडर्मा की स्थिति होती है, तो उसे तुरंत चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए क्योंकि यह जानलेवा हो सकती है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में, शीतपित्त के उपचार की विविध विधियाँ हैं, जो रोगी के लक्षणों के आधार पर चयनित की जाती हैं।

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