Piles-Complete natural Solution

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Piles|बवासीर|Bavashir-Complete natural Solution

पाइल्स यानि की बवासीर की बीमारी | एलॉपथी में पाइल्स को हीमोराइड्स भी कहा जाता हैं | यह बीमारी किसी भी उम्र के लोग में हो सकती हैं किन्तु प्रायः यह वयस्क लोग में अनियमित जीवनशैली और अनियमित खानपान के कारण होता हैं | यह बीमारी स्त्री या पुरुष दोनों में हो सकती हैं |Piles-Complete natural Solution की चर्चा निचे विस्तार से की गयी हैं |

Piles-Complete natural Solution. Piles (बवासीर) - Causes, Symptoms, Treatment, Prevention Description: Piles is a common problem that can cause pain, bleeding, and discomfort. There are many causes of piles, including constipation, diarrhea, pregnancy, and obesity. There are also many treatments for piles, including medication, surgery, and home remedies. Focus keywords:  piles बवासीर causes symptoms treatment prevention Additional information:

पाइल्स में गुदा में बहुत ही तेज दर्द होता हैं और कभी कभी तेज दर्द के साथ रक्त स्राव भी होता हैं | 

पाइल्स के प्रकार|Type of Piles|Piles ke prakar :

पाइल्स दो प्रकार का होता हैं 

खुनी पाइल्स|(Bloody Piles)|Khuni Piles : 

खुनी बवासीर में रोगी के गुदा से मॉल त्याग करते समय बहुत ही अधिक मात्रा में या थोड़ा थोड़ा खून जाता हैं | मॉल त्याग करते समय रोगी को गुदा में भयंकर दर्द का सामना करना पड़ता हैं | कभी कभी यह दर्द इतना भयंकर होता हैं की रोगी की स्थिति असामान्य हो जाती हैं |

बाद्दी पाइल्स| Badi Piles :  

इसमें रोगी के गुदा में मॉल त्याग करते समय या ह्मेशा भयंकर दर्द या कटाने की तरह दर्द होता हैं |


पाइल्स होने का क्या लक्षण होता हैं | Symptom of Piles | Piles hone ke Lakshan kya hote hain?

सामान्यतया यह देखा गया हैं की वो हर महिला या पुरुष जिसका पाचन सही नहीं हैं | उसे कुछ समय बाद कब्ज की समस्या हो जाती हैं और यह कब्ज कुछ समय बाद धीरे धीरे पाइल्स का रूप ले लेती हैं | यदि किसी व्यक्ति को पाइल्स नहीं हुआ हैं लेकिन उसके शरीर में यदि निचे दिए गए लक्षण दिख रहे हैं तो उस महिला या पुरुष को सावधान हो जाने की जरुरत हैं ताकि समय रहते वह उसका इलाज या उपचार कर ले ताकि पाइल्स की समस्या न पैदा हो| 

रोगी को सबसे पहले खाना खाने का जी नहीं करता हैं |

  • उससे कुछ बहार का चटपटा खाने का जी करता हैं | धीरे धीरे उसका पेट नियमित रूप से साफ़ होना बंद हो जाता हैं |

    फिर रोगी को धीरे धीरे कब्ज की समस्या होने लगाती हैं |

    कब्ज धीरे धीरे गहरा होने लगता हैं और रोगी को मॉल त्याग कई दिनों बाद होता हैं |

    मल शरीर से आसानी से नहीं निकलता हैं , यह कड़ा हो जाता हैं |

    पेट अच्छी तरह साफ़ नहीं होता |

    धीरे धीरे मल के साथ थोड़ा खून निकलने लगता हैं |

    मल द्वार के अगल बगल कट का निसान हो जाता हैं |

    धीरे धीरे खून ज्यादा जाने लगता हैं |

    मलद्वार के अंदर अंगूर की तरह गुच्छा बन जाता हैं जोकि मल त्याग करते समय बहार आ जाता हैं |

    यदि ये सारी समस्या हैं तो आप पाइल्स रोग से पीड़ित हैं |

 

पाइल्स होने का क्या कारण होता हैं | Casue of Piles | Piles hone ka karan kya hota hain ?

मल त्याग के दौरान तनाव: बवासीर के प्राथमिक कारणों में से एक मल त्याग के दौरान अत्यधिक तनाव है। तनाव से मलाशय और गुदा क्षेत्र में रक्त वाहिकाओं पर दबाव पड़ता है, जिससे उनमें सूजन हो जाती है। ऐसा अक्सर तब होता है जब किसी को कब्ज़ हो जाता है और उसे मल त्यागने के लिए अधिक बल लगाना पड़ता है।


दीर्घकालिक कब्ज | Chronic Constipation| Purani kabj :

लम्बे समय तक कब्ज होने से बवासीर की समस्या पैदा हो सकती हैं | कब्ज पुराना होने से , मनुस्य के शरीर में मल कड़ा हो जाता हैं  जिसे त्याग करते समय मलद्वार के कोशिकाओं में काफी दबाव होता हैं | फलस्वरूप बवासीर का होना स्वाभाविक हो जाता हैं |

क्रोनिक डायरिया:

जब  किसी व्यक्ति को डायरिया की शिकायत होती हैं और बार बार पानी जैसा मल होता हैं | तब मलद्वार में सूजन हो जाता हैं और कभी कभी यह अधिक समय तक होने से बवासीर का रूप ले लेता हैं |

मोटापा:

शरीर का अतिरिक्त वजन और मोटापा पेट के दबाव को देता हैं , जो मलाशय क्षेत्र में रक्त वाहिकाओं पर दबाव डालता है और बवासीर के विकास में योगदान करता है।

गर्भावस्था और प्रसव:

गर्भवती महिलाओं को अक्सर हार्मोनल परिवर्तनों के साथ-साथ उनके शरीर में रक्त संचार की बढ़ी हुई मात्रा का अनुभव होता है। इन कारकों के कारण पेल्विक क्षेत्र में रक्त वाहिकाओं में सूजन हो जाती  है, जिससे गर्भवती महिलाओं में बवासीर होने का खतरा अधिक होता है। बच्चे को जन्म देने की क्रिया से भी दबाव बढ़ सकता है और बवासीर का विकास हो सकता है।


गतिहीन जीवन शैली:

पर्याप्त गति के बिना लंबे समय तक बैठे रहना या खड़े रहना गुदा क्षेत्र में रक्त के प्रवाह को बाधित कर सकता है, जो बवासीर के विकास में योगदान देता है। ऐसी नौकरियों वाले लोगों को अधिक जोखिम होता है, जिनमें लंबे समय तक बैठे रहना पड़ता है।

उम्र बढ़ना:

जैसे-जैसे लोगों की उम्र बढ़ती है, मलाशय और गुदा क्षेत्र में ऊतक कम सहायक हो जाते हैं, जिससे रक्त वाहिकाएं सूजन और बवासीर के विकास के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं।

आनुवंशिकी:

बवासीर के विकास में एक आनुवंशिक घटक होता है। यदि आपके परिवार में बवासीर का इतिहास है, तो आपको इसके विकसित होने का अधिक खतरा हो सकता है।

आहार:

फाइबर में कम और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में उच्च आहार से पुरानी कब्ज और मल त्याग के दौरान तनाव हो सकता है। अपर्याप्त फाइबर का सेवन भी बवासीर के विकास में योगदान कर सकता है।

भारी वस्तुएं उठाना:

नियमित रूप से भारी वस्तुएं उठाना, खासकर अगर गलत तरीके से उठाया जाए, तो पेट के अंदर दबाव बढ़ सकता है और मलाशय क्षेत्र पर दबाव पड़ सकता है, जिससे संभावित रूप से बवासीर हो सकता है।

पाइल्स के रोगी अपने खान पान में क्या बदलाव करें ?

पाइल्स के रोगी अपने आहार में आमूलचूक परिवर्तन कर के अपनी बवासीर की समस्या को कण्ट्रोल कर सकते हैं |

फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ:

बवासीर के रोगी को अपने खाने में फाइबर युक्त खाने का प्रयोग करना चाहिए | फाइबर युक्त फल , फूल और सब्जियों का प्रयोग करने से रोगी का पेट आसानी से साफ़ हो जाता हैं | जिससे रोगी को मल त्याग करते समय दिक्कत नहीं होती हैं | फाइबर मल को नरम कर देता हैं जिसके कारन मल शरीर से आसानी से बहार आ जाता हैं | रोगी के मॉलद्वार पर दबाव काम पड़ता हैं और बवासीर का घाव सही होने लगता हैं |


फाइबर युक्त फल

अनार (Pomegranate)
नाशपाती (Pear)
अंगूर (Grapes)
सेब (Apple)
कच्चा पपीता (Raw Papaya)
केला (Banana)
ब्लूबेरी (Blueberry)
स्ट्रॉबेरी (Strawberry)


फाइबर युक्त फलियां

चना (Chickpeas)
उड़द (Urad Dal)
मसूर (Masoor Dal)
अरहर (Arhar Dal)
राजमा (Rajma)
सोयाबीन (Soybean)

फाइबर युक्त सब्जियां

गाजर (Carrot)
पालक (Spinach)
बीन्स (Beans)
ब्रोकोली (Broccoli)
फूलगोभी (Cauliflower)
शिमला मिर्च (Capsicum)
भिंडी (Okra)
आलू (Potato)

इन फलों, फलीदार सब्जियों और सब्जियों को अपने आहार में शामिल करके, आप अपने दैनिक फाइबर आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करता हैं | फाइबर पाचन स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है और कब्ज, वजन घटाने और मधुमेह जैसी स्थितियों को रोकने में करता हैं |


हाइड्रेट रहे |

हाइड्रेट का मतलब है कि शरीर में पर्याप्त मात्रा में पानी या तरल पदार्थ होना। यह शरीर के सभी अंगों और ऊतकों के लिए महत्वपूर्ण है। पानी शरीर के तापमान को नियंत्रित करने, अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने, और कोशिकाओं को स्वस्थ रखने में मदद करता है।

हाइड्रेटेड रहने के लिए, आपको दिन भर में पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए। आमतौर पर, वयस्कों को प्रति दिन लगभग 8 गिलास पानी पीने की सलाह दी जाती है। हालांकि, आपकी पानी की आवश्यकताएं आपकी गतिविधि के स्तर, जलवायु और अन्य कारकों के आधार पर भिन्न हो सकती हैं।


बवासीर के रोग को दूर करने का बाहरी उपाय क्या हैं ?

गर्म पानी में भिगोना : 

बवासीर के रोगी को गर्म पानी में सूजन वाले हिस्से को दिन में कई बार करीब १५-२० मिनट तक भिंगो के रखना लाभकारी होता हैं | इसको करने से दर्द भी काम और सूजन दोनों काम हो जाती हैं |  इसके लिए रोगी बाथ बेसिन का उपयोग कर सकता हैं | बाथ बेसिन में गर्म पानी , जो की सहने योग्य हो , उसमें अपने गुदा को भिंगो के रख सकता हैं |

एलोवेरा जेल:


एलोवेरा में प्राकृतिक सूजनरोधी गुण होते हैं और यह खुजली और जलन से राहत दिला सकता है। प्रभावित क्षेत्र पर थोड़ी मात्रा में एलोवेरा जेल लगाएं।

विच हैजल के पौधे के पत्ते का प्रयोग :


विच हेज़ल एक फूल वाला पौधा है जो उत्तरी अमेरिका में पाया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम हैमामेलिस वर्जिनियाना है। विच हेज़ल के पत्ते, छाल और बीज औषधीय गुणों के लिए उपयोग किए जाते हैं।

विच हेज़ल में एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-सेप्टिक और एस्ट्रिंजेंट गुण होते हैं। इसका उपयोग त्वचा और बालों के लिए विभिन्न समस्याओं के इलाज के लिए किया जाता है।सूजन और लालिमा को कम करता है। विच हेज़ल में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं जो त्वचा की सूजन और लालिमा को कम करने में मदद करते हैं। आप रूई के गोले में विच हेज़ल लगा सकते हैं और राहत के लिए इसे प्रभावित क्षेत्र पर धीरे से लगा सकते हैं।

बर्फ के पैक:


एक साफ कपड़े में आइस पैक लपेटकर प्रभावित क्षेत्र पर 15-20 मिनट के लिए लगाने से सूजन कम करने और दर्द को सुन्न करने में मदद मिल सकती है।

प्राकृतिक मलहम:


राहत के लिए नारियल तेल, जैतून का तेल और सेब साइडर सिरका जैसे कुछ प्राकृतिक उपचार प्रभावित क्षेत्र पर लगाए जा सकते हैं। इन पदार्थों में सुखदायक गुण हो सकते हैं।

ढीले-ढाले कपड़े पहनें:


तंग कपड़े बवासीर के कारण होने वाली परेशानी को बढ़ा सकते हैं। जलन कम करने के लिए ढीले-ढाले, सांस लेने योग्य सूती अंडरवियर और कपड़े चुनें।

अच्छी स्वच्छता बनाए रखें:


मल त्याग के बाद, गुदा क्षेत्र को गीले, बिना खुशबू वाले टॉयलेट पेपर या मुलायम कपड़े से धीरे से साफ करें। कठोर या सुगंधित साबुन का उपयोग करने से बचें जो क्षेत्र को और अधिक परेशान कर सकते हैं।

उचित शौचालय की आदतें:


मल त्याग के दौरान तनाव से बचें। अपना समय लें और शौचालय के दौरान अपने पैरों को ऊपर उठाने के लिए स्टूल या फुटरेस्ट का उपयोग करें। यह तनाव को कम करने और मल त्याग को आसान बनाने में मदद कर सकता है।

नियमित रूप से व्यायाम करें:


शारीरिक गतिविधि स्वस्थ मल त्याग को बढ़ावा दे सकती है और कब्ज के खतरे को कम कर सकती है, जो बवासीर का एक सामान्य कारण है।

पाइल्स का आयुर्वेदिक इलाज (फुलप्रूफ) : 

अभी तक हमने जो भी पाइल्स के बारे में जाना हैं उससे साफ़ पता चलता हैं की कब्ज ही पाइल्स की जननी हैं | इसलिए पाइल्स के रोगी निचे बताये गए उपाय को अपना कर अपनी पाइल्स की समस्या से कुछ दिनों में निजात पा सकते हैं | यहाँ हम जो भी उपाय बातएंगे ये हमारे आयुर्वेदा और प्राचीन ग्रंथो से लिया गया हैं , जिसका प्रयोग करके कई लोग इस बीमारी से निजात पा चुके हैं | इसलिए इसका प्रयोग निसंदेह लाभकारी हैं जो की कुछ इस प्रकार हैं |


पेट की कब्ज की समस्या का इलाज सबसे पहले करना जरुरी हैं |

बवासीर के रोगी को सबसे पहले यह समझाना जरुरी हैं की उसकी कब्ज की प्रॉब्लम ही उसके पाइल्स की जड़ हैं | इसलिए आप कब्ज की समस्या से सबसे पहले निजात पाएं | इसके लिए आजकल बाजार में कई चूरन मौजूद हैं | यदि आप को उससे फायदा नहीं हो रहा हैं तो कब्ज की समस्या का आर्टिकल पढ़े उसमें हमने कब्ज की समस्या के समाधान की कई दवाइयां बताई हैं जिसका प्रयोग करके कोई भी कब्ज की समस्या से मुक्ति पा सकता हैं |


गाय के दूध का प्रयोग :

बवासीर के रोगी को देशी गाय के दूध  और नीबू का प्रयोग बहुत ही हितकर होता हैं | सुबह खली पेट एक गिलाश गाय का दूध ले और उसमें एक नीबू का रास गार ले और तुरंत पी लें | पिने के बाद एक घंटे तक किसी भी चीज का सेवन नहीं करें | यह प्रयोग खुनी और वादी बवासीर को रोकने का लाभकारी प्रयोग हैं | इसका प्रयोग लगातार ६ महीने तक करें |


गौमूत्र और गुड़ का प्रयोग :

यहाँ गौमूत्र का जो प्रयोग बता रहा हूँ वह प्रयोग किया गया है और १०० प्रतिशत कारगर इलाज हैं | आज कल कुछ विद्वान लोग जो भारतीय संस्कृति और ज्ञान को नकारते हैं वो इसका विरोध भी करते हैं किन्तु मैं यहाँ उन परेशां रोगियों को जरूर कहूंगा की इसका १५ दिन तक प्रयोग करें और परिणाम आप खुद बताएँगे |

एक कप गौमूत्र लें उसमें गुड़ के चने बराबर ५ दाने डालें | ५ मिनट बाद जब गुड़ उसमें घुल जाये तो उस गौमूत्र को पी लें | इससे आप का बवासीर समाप्त हो जायेगा | ९० दिन का प्रयोग सफल होता हैं |


सुरन का प्रयोग बवासीर के रोगी के लिए : 

सुरन से सुरन वट्टी बनायीं जाती हैं | आयुर्वेद में बहुत पहले इसका प्रयोग हमें बताया गया लेकिन समय के साथ यह ज्ञान मिट गया और हमें इसका पता नहीं की ये बवासीर की एक उत्तम दवा हैं | चलिए हम अब बात करते हैं की सुरन वट्टी कैसे बनायीं जाती हैं |

सुरन को उबाल कर इसे सूखा लें | फिर उससे मिक्सी में पीस कर उसका पाउडर बना लें | यह पाउडर करीब  ३७५ ग्राम लें |

उसमें चित्रक १८७ ग्राम मिलाएं | चित्रक पंसारी के दुकान से मिल जायेगा |चित्रक औषधि का दूसरा नाम सिंदूर है। यह एक जड़ी-बूटी है जिसका उपयोग आयुर्वेदिक चिकित्सा में किया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Plumbago zeylanica है।

चित्रक में एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-फंगल और एंटी-ऑक्सीडेंट गुण होते हैं। इसका उपयोग विभिन्न प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज के लिए किया जाता है, जिनमें शामिल हैं:

  • खुजली
  • दाद
  • कुष्ठ
  • बवासीर
  • कब्ज
  • पीलिया
  • सिरदर्द
  • मसूड़ों में सूजन

इसके अलावां उसमें सोंठ  ४७ ग्राम , काली मिर्च  २३ ग्राम और गुड़ करीब १.२६३ किलो मिला लें | इसको मिला कर इसकी गोली बना लें | रोज सुबह , दोपहर और शाम को ३-३ गोली का सेवन करें | इससे बवासीर समाप्त हो जाता हैं |


नीबू के रस  का एनिमा लेने का प्रयोग :

१ से २ कागजी नीबू का रस एनिमा के साधन से गुदा में लें | यह प्रयोग ३ दिन के अंतराल पर करें | ३ बार के प्रयोग से ही बवासीर में लाभ होता हैं |इसके अलावां अरंडी के तेल से गुदा पर मालिश करें | जब यह प्रयोग करें तब हरड़ या छोटी हरड़ के चूर्ण का प्रयोग करीब ५ ग्राम सादे पानी के साथ दिन में तीन बार लें | इससे तुरंत लाभ होता हैं |


नीम के तेल का प्रयोग :

बवासीर के रोगी को नीम का तेल का प्रयोग मस्से पर लगा कर करना हितकारी होता हैं | रोकी इसका ३-४ बून्द पन्नी में मिलकर पी सकता हैं |

नीम के तेल के बवासीर में निम्नलिखित लाभ :
  • सूजन और दर्द को कम करता है।
  • खुजली और जलन को कम करता है।
  • बवासीर के मस्से को छोटा करने में मदद करता है।
  • बवासीर से होने वाले रक्तस्राव को रोकने में मदद करता है।
  • बवासीर से होने वाले संक्रमण को रोकने में मदद करता है।

बवासीर का उपचार इन्द्रफला से :

इंद्रफला एक आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी है जिसका उपयोग विभिन्न प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज के लिए किया जाता है, जिनमें बवासीर, कब्ज, दस्त, मधुमेह, और गठिया शामिल हैं। इंद्रफला को अशोक या अशोक छाल के नाम से भी जाना जाता है।

इंद्रफला के वैज्ञानिक नाम सर्जिसा रोबोरा हैं। यह एक पेड़ की छाल है जो भारत, श्रीलंका, और दक्षिण पूर्व एशिया में पाया जाता है। इंद्रफला में एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-फंगल, और एंटी-ऑक्सीडेंट गुण होते हैं।

इंद्रफला का उपयोग करने के कई तरीके हैं। इनमें से कुछ तरीके इस प्रकार हैं:

  • इंद्रफला चूर्ण लें: इंद्रफला चूर्ण को दूध या पानी में मिलाकर दिन में दो बार लिया जा सकता है।

  • इंद्रफला का काढ़ा पिएं: इंद्रफला का काढ़ा बनाकर दिन में दो बार पिया जा सकता है।

  • इंद्रफला की क्रीम या लोशन का उपयोग करें: इंद्रफला की क्रीम या लोशन को प्रभावित क्षेत्र पर दिन में दो बार लगाया जा सकता है।


छाछ के प्रयोग से बवासीर का इलाज : 

करीब २ लीटर तजि छाछ ले कर उसमें  ५० ग्राम जीरा पीस कर मिला लें | स्वाद के अनुसार उसमें काला या पहाड़ी नमक मिला लें |  अब जब भी आप को प्यास लगे तब पानी के जगह यह छाछ पिए | ऐसा आप को ५ दिन तक करना हैं | आप देखेंगे की आप के बवासीर के मस्से धीरे धीरे समाप्त हो जायेंगे | यह प्रयोग करीब १५ दिन तक करना स्थायी समाधान होता हैं |

बवासीर के पुराने रोगी को छाछ में सोंठ और हींग भी मिला कर लेना चाहिए |

खुनी बवासीर का क्या उपाय हैं ?

जीरे को पीस कर  उसका पाउडर बना लें | अब जीरे के पाउडर का पेस्ट बना लें | पेस्ट का लेप बवासीर पर करने से खुनी बवासीर में तुरंत आराम होता हैं |
इसके अलावां जीरे का पाउडर , उतनी मात्रा में गाय का घी और शक्कर लेने से भी खुनी बवासीर में आराम होता हैं |
यदि किसी रोगी को खुनी बवासीर की शिकायत हैं तो रोगी को गर्म खाना नहीं खाना चाहिए |


बरगद के पत्ते के दूध से बवासीर का इलाज : 

बरगद के पत्ते का दूध खुनी बवासीर का बहुत ही कारगर इलाज हैं | इसके दूध का सेवन करने से खुनी बवासीर में तुरंत आराम मिलता हैं | इसके दूध को मस्से पर लगाना भी हितकारी होता हैं | नारियल के तेल में बरगद के दूध को मिलकर इसकी मालिश करने से धीरे धीरे मस्से छोटे होने लगते हैं |

अनार के छिलके से खुनी बवासीर का इलाज :

अनार के छिलके को आयुर्वेद में बवासीर के इलाज के लिए एक प्रभावी जड़ी-बूटी माना जाता है। अनार के छिलके में एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-वायरल और एंटी-ऑक्सीडेंट गुण होते हैं। ये गुण बवासीर के लक्षणों को कम करने में मदद कर सकते हैं।

अनार के छिलके का चूर्ण नागकेशर के साथ देने से खुनी बवासीर में तुरंत लाभ मिलता हैं |


Frequently asked questions:

क्या घरेलु उपचार से बवासीर सही होता हैं ?

हाँ | घरेलु उपचार इसकी एक कारगर दवा हैं | जैसा की ऊपर बताया गया हैं की कब्ज सही करें और ऊपर बताये गए उपाय करने से रोगी को तुरंत लाभ मिलना चालू हो जाता हैं |

क्या गौमूत्र का प्रयोग पाइल्स में लाभकारी हैं ?

जी हाँ | गौमूत्र का प्रयोग पाइल्स में बहुत ही लाभकारी हैं | मैंने तो कई रोगियों को गौमूत्र के प्रयोग से सही किया हैं | इसका प्रयोग ऊपर बताया गया हैं |


क्या ऑपरेशन करना सही होता हैं ?

आजकल अलोपथ में ऑपरेशन करने की सलाह दी जाती हैं | मेरा व्यक्तिगत मानना हैं की बवासीर के रोगी को  ऑपरेशन से बचना चाहिए | उसे सबसे पहले अपने शरीर से कब्ज ख़त्म करने पर ध्यान देना चाहिए और फिर उचित खान पान और इलाज से अपनी पुराणी बीमारी को समाप्त कर लें |

क्या होम्योपैथी में बवासीर का इलाज हैं ?

जी हाँ | मैंने तो कई रोगियों को होम्यो और आयुर्वेदिक प्रयोग से सही किया हैं | इन दोनों विधाओं का प्रयोग एलॉपथी से कहीं बेहतर हैं |

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